बिहेवियरल इकोनॉमिक्स बिहेवियरल इकोनॉमिक्स बड़ी दिलचस्प चीज़ है.पैसों के मामले में लोग सिर्फ दिमाग से फैसले नहीं लेते. अक्सर इंसानी जज्बात दिमाग पर हावी हो जाते हैं , इसलिए आर्थिक मामलों को समझने के लिए अर्थशास्त्र के साथ मनोविज्ञान को समझने की भी जरूरत है. यही बिहेवियरल इकोनॉमिक्स कहलाता है. पैसे के साथ इंसान का रिश्ता उलझा हुआ है. लालच, भविष्य का डर और खर्च करने से पैदा होने वाला अपराध बोध ऐसे जज्बात हैं जो इस उलझन को और बढ़ाते हैं.बिहेवियरल इकोनॉमिक्स के जरिए हम पैसे से जुड़ी आदतों को समझने की कोशिश करते हैं इनमे से कुछ आदतों के बारे में आप भी जानिए विद्वान मानते हैं कि पैसे को जब हम अपनी जेब से जुदा करते हैं, तो हमें तकलीफ होती है,यह तकलीफ तब ज्यादा होती है ,जब हम नोटों की शक्ल में पैसा दे रहे हों. क्रेडिट कार्ड या उधार माल खरीदते वक्त यह तकलीफ कम हो जाती है. यही कारण है किस्तों में उधार सामान खरीदते या क्रेडिट कार्ड के जरिए खर्च करते वक्त लोग कई बार गैर जरूरी चीजें खरीद लेते हैं. मतलब कि यदि टाइम ऑफ पेमेंट और टाइम ऑफ परचेस को अलग कर दिया जाए तो यह तकलीफ कम हो जाती है. बिहेवियरल इकोनॉमिक्स हमें बताता है कि इंसानों के लिए हर पैसे का रंग अलग होता है . तनख्वाह में मिले पैसे किफायत से खर्च किए जाते हैं , जबकि बोनस के मामले में फिजूलखर्ची चल जाती है. पैसा खर्च करना अपराध बोध लाता है, कई लोग सक्षम होते हुए भी पैसा खर्च नहीं कर पाते क्योंकि उनका दिमाग खर्च को लेकर ज्यादा अपराध बोध महसूस करता है. मान लीजिए किसी महिला को एक साड़ी पसंद आती है, पर उसे लगता है दुकानदार उसकी कुछ ज्यादा ही कीमत बता रहा है. वह उसे नहीं खरीदती. उसका पति यह देख कर अगले दिन वही साड़ी खरीद लाता है और उसे तोहफे में देता है. सिर्फ आर्थिक दृष्टि से समझे तो पत्नी को नाराज होना चाहिए क्योंकि साड़ी असल कीमत से ऊंचे दाम पर खरीदी गई है और इस तरह नुकसान हुआ है. लेकिन वह खुश हो जाती है. साड़ी की कीमत रुपयों में उतनी ही है लेकिन किसी दूसरे के द्वारा लाए जाने की वजह से pain of paying महसूस नहीं हो रहा है. इसलिए आर्थिक कीमत वही होते हुए भी मनोवैज्ञानिक कीमत बदल गई है औंर अपराध बोध भी निपट चूका हैं. मुख़्तसर तौर पर ये ही बिहेवियरल इकोनॉमिक्स हैं औंर इसे जानना जरुरी हैं…. सी. एस. केतन आपटे

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